Jeevan Rekha


” जीवन रेखा ” 

हमारी परिकल्पना के अनुसार विधुत-धारा ब्रहस्पति की अंगुली के माध्यम से प्रवेश करके ह्रदय और मस्तिष्क के पश्चात् जिस तीसरी रेखा में प्रवाहित होती है वह जीवन रेखा है. यह रेखा ठीक ब्रह्स्पति की अंगुली के निचे से निकलकर निम्न मंगल और शुक्र पर्वत को घेरती हुई प्रायः शुक्र पर्वत के निचे हाथ के मूल में समाप्त होती है. यह रेखा विभिन्न कालावधियों के दौरान जातक के स्वास्थ्य, उसकी सामान्य शारीरिक क्षमता तथा स्नायविक या मासपेशियों की शक्ति पर निर्भर रहने को प्रकट करती है. इस तरह यह रेखा जातक के जीवन में अनेक व्योरेवार घटनाओं क लेखा-जोखा रखकर एक एसा आधार तैयार करती है, जिसके हाथ में अन्यत्र पाए गए लक्षणों की पुष्टि हो सके या उन लक्षणों की व्याख्या के लिए सहारा लिया जा सके.

यह जातक के जीवन की उर्ध्वगामी या अधोगामी दिशा को प्रकट करने के साथ ही उसके जीवन के उस वर्ष को भी निर्दिष्ट करती है, जब ये शक्तियां चरमोत्कर्ष पर होती है. अधिकांश मामलों में यह रेखा जीवन के संभावित अंत और म्रत्यु का कारण बनने वाली बीमारी एवं रुग्णता का संकेत भी देती है.

रेखाएं जातक के जीवन का मानचित्र होती है, इस धरना के सही प्रमाणित हिने तक इस प्रशन का उत्तर नहीं दिया जा सकता की जीवन रेखा इन बातों को क्यों प्रकट करती है. किए जा रहे अनेक प्रयोगों और परीक्षणों से यह सिद्ध हो गया है की इन समस्त तथ्यों की जानकारी जीवन रेखा से ही प्राप्त होती है. अतीत से लेकर वर्तमान तक के विवेचन से यह विश्वास हो जाता है की आज भी वाही सुचना उसी स्त्रोत से प्राप्त की जा सकती है. जीवन रेखा की व्याख्या न कर सकने की दिशा में भी सही परिकल्पना के आधार पर जातक के जीवन की स्वाभाविक दिशा पर विश्वास करना आवश्यक है. जीवन रेखा द्वारा सर्वप्रथम जातक के स्वास्थ्य और उसकी शारीरिक सामर्थ्य को दर्शाए जाने के कारण जातक के स्वास्थ्य, उसकी सामान्य तेजस्विता और शारीरिक क्षमता का ज्ञान सहज ही हो जाता है और इस सामग्री के द्वारा परिणामों का अनुमान लगाया जाना कठिन नहीं होता. बस, यही धरना जीवन रेखा के गहन अध्ययन करने का आधार होती है तथा अनेक प्रोगों द्वारा इसे सही प्रमाणित भी किया जा चूका है.

जीवन रेखा के विद्यमान न रहने का कोई आधार नहीं है. क्योंकि ऐसे उदाहरण बिरले ही होंगे, परन्तु कई मामलों में इस रेखा की उपस्थिति का पता लगाने के लिए गहन प्रयास करना पड़ता है. प्रत्येक जातक के हाथों में यह रेखा किसी-न-किशी रूप में अवश्य विद्यमान रहती है. ऐसे कुछ मामलों में, जिनमे जीवन रेखा के अस्तिव का बिलकुल भी पता न लग सका, यह देखा गया की ऐसे जातक शारीरिक शक्ति के बल पर नहीं, अपितु स्नायविक शक्ति के बूते पर जीवित रहते हैं तथा अधिक विश्राम और आहार-विहार में संतुलन स्थापित करके अपनी मानसिक शक्तियों के बल पर जीवन-ज्योति को बुझाने से बचाए रखते हैं .